सोमवार, 4 जनवरी 2010


मुझे लगता है हम बहुत आगे दुनिया से निकल सकते थे लेकिन आज हम वहां नही पहुंच पाए है जहां

हमें पहुंचना चाहिए ...इसका सबसे बडा कारण है हमें आज भी दूसरे की थाली का भात अच्छा लगता है वाली कहावत पर चल रहे है ....हमने दुनिया को जीरो दिया....हमने सारी दुनिया को सभ्यता सिखाई ....हमने ये सिखाया कि आखिर जीवन में परिवार की महत्ता क्या होती है ....हमने संस्कार के ऐसे बीज बोए जिनकी महक दुनिया भर में फैल रही है ....विदेशी लोग आते है हमारे संस्कार हमारी सभ्यता हमारी परिवारिक शैली को देखकर हैरान होते है....तरह तरह के सवाल करते है ....हमारे परिधानों को पहनकर गौरव महसूस करते है औऱ बाद में हमारी सभ्यता हमारी जीवन शैली को देखकर नतमस्तक हो जाते है ....लेकिन हमें अपनी चीजें अच्छी नही लगती है ....न तो हमें अपनी सभ्यता अच्छी लगती और न ही हमें हमारे संस्कार अच्छे लगते है ....सारी दुनिया ये धीरे धीरे मान रही है कि अगर वास्तव में जीवन के महत्व और जीवन को तरीके से जीना है तो हमें भारतीय सभ्यता और उसके संस्कारों को अपनाना ही होगा .....लेकिन हमें ये अच्छा नही लगता .....हम दिखावे के पीछे भाग रहे है ....आज की नई पीढी की सोंच से सभ्यता और संस्कारों की तो दिन पर दिन दूरी बढती जा रही है ....अब थोडा परिवार की बात कर लेते है .....बेटा थोडा बडा हुआ और जैसे ही उसने कालेज में कदम रखा तो उसे सबसे पहले जो जरुरी चीज लगती है वो है गर्लफ्रेंड क्योकि इसके बिना उसका स्टेटस सिंबल काफी डाउन माना जाता है यही हाल लडकियों का है .....आज की नई पीढी को मां बाप या फिर अपने से किसी भी बडे का रोक टोंक पंसद नही क्योकि ये उनकी निजी जिंदगी में दखल है .....साथ ही ये भी कहना होता है कि वो नही चाहते कि उनकी व्यक्तिगत स्वतत्रंता में कोई हस्तक्षेप करे.....इसके बाद चाहिए उन्हे एक गाडी और एक मोबाइल .....दोनों होने का मतलब अब पढाई हो गई ....और कडाई का समय शुरु हो गया .....पढाई इस बात को ध्यान में होती है कि वो नौकरी दिळा सके ....इसलिए नही होती कि उससे सामाजिक सस्कारों की बुनियाद पडे .....शायद यही कारण है कि आज की पीढी दिमागी तौर पर तो दुरुस्त है लेकिन सामाजिक संस्कारों के मामले में जीरो .....अब किसी भी लडकी को शालीन कपडों में देखने को आखें तरस जाती है ....लडकियों में तो जींस पहनने का इस तरह क्रेज हो गया है कि अगर उन्होने जींस नही पहना है तो समझों लोग ये समझेंगें कि वो जाहिल गंवार और अनपढ है ....इतना ही नही जींस इस तरह की होगी जैसी जिस्म के हर अंग की ढलाई दुनिया को दिखाने की जरुरत है ....मैं ये मानता हूं कि जमाना बदला है विकास की हमने सीढियां चढी है ....लेकिन इसको कहा तक सही कहा जाएगा कि हम इस विकास में उन संस्कारों को छोडते चले जा रहे है जो हमारे आगे बढने के लिए अत्यंत जरुरी है ....सच्चाई तो ये है कि हम आज बाहर से तो उंचे उठ रहे है लेकिन अंदर से गिरते चले जा रहे है .....कभी बच्चों को सिखाया जाता था कि सुबह उठकर मां बाप को प्रणाम करना लेकिन आज बच्चों को सिखाया जाता है बेटा तुम्हे इंजीनियर बनना है डॉक्टर बनना है....अभिभावकों में भी सफलता की इस कदर बेताबी है कि वो ये नही देख रहे है कि आने वाली सफलता का माध्यम क्या है ....सिर्फ सफलता चाहिए ....हालांकि इस परिणाम जब अभिभावकों के सामने आता है तो उन्हे अपनी गलती का अहसास होता है लेकिन तब तक देर हो चुकी होती है ....क्योंकि तब तक बच्चा जवान हो चुका होता है ...लचीला पन खत्म होकर उसमें कडकपन आ चुका होता है ....और इस तरह की अवस्था आ जाती है कि अगर उसे मोडा जाता है तो या तो वो टूट जाता है या फिर मुडता ही नही ....बच्चे सफल हो जाते है मां बाप को भूल चुके होते है क्योंकि उन्हे सिर्फ सफलता की बात सिखाई जाती है संस्कारों की नही शायद यही कारण है कि आज की पीढी हम दो हमारे दो पर चलती जा रही है .....सोचना हम सब को ही क्योंकि हम ही मां बाप है और हम ही नई पीढी ......

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