
सपनों को बुनने में जितनी मेहनत लगती है... उससे कहीं ज्यादा दर्द की टीस उस वक्त होती है जब वो सपना टूटकर बिखर जाता है ....और ये दर्द तब और बढ जाता है जब इस सपने को तोडने में किसी अपने का हाथ होता है ....हम भारतीयों की ये कमजोरी कहें या फिर इंसान की फितरत कि वो किसी चीज को तब तक याद रखता है जब तक वो चीज सफलता के फलक पर चमकती है ....जैसे ही वो वहां से उतरी उन लोगों की नजरों में ही वो धूमिल हो जाती है जिसे कभी वो ही लोग सबसे चमकदार कहते थे...शायद आपको याद नही होगा ....लेकिन अतीत के पन्नों से भी कभी कभी भविष्य की एक ऐसी इमारत बन जाती है जो कालजयी हो जाती है ....जी हां मैं बात कर रहा हूं सांथी सौंदराजन की जिन्होने भारत के लिए एशियाई खेलों में रजत पदक जीता .... लेकिन द्दिलिंगी होने के आरोपों के बाद उनसे पदक छीन लिया गया ...इतना ही इसके बाद उनकी कोई खोज खबर भी नही ली गई .... सांथी ने विपरीत परिस्थियों के होने के बावजूद अपनी गरीबी से लडकर वतन का गौरव बढाने के लिए दिन रात मेहनत करके इस बात का सपना संजोया था कि वो देश के लिए पदक जीत कर न सिर्फ देश का नाम करे बल्कि खुद पर भी देश का गौरब बढाने के लिए फक्र कर सकें लेकिन इससे पहले कि ये सपना सच होकर सामने आता, सपना टूटकर बिखर गया ...जो नेता बडे बडे बुद्दिमान बडे बिचारक और दुनिया के महान लोग जो इस बात को कहते हुए अघाते नही है कि मतलब के लिए ही सब कुछ मत करो उन्ही के सामने सांथी की हालत सोने के अंडे वाली मुर्गी से गधे के गोबर वाली हो गई लेकिन सभी मौन रहे ....ये ठीक है कि सांथी सौंदराजन पर द्दिलिंगी का आरोप लगा लेकिन इसमें सौंदराजन क्या कसूर ....क्या वो देश के लिए पदक जीतने का सपना नही संजो सकती थी ....क्या उसे इस बात का अधिकार नही है कि अपने देश का नाम उंचा कर सके .....बडी बडी किताबों और ग्रंथो में कहा गया है कि इंसान की इंसानियत के लिए और देश के नागरिक के लिए उसमें देश का गौरव बढाने का गुण जरुर होना चाहिए..... ये विकसित नही किया जा सकता बल्कि उसकी मौलिकता में होता है .....और जब किसी की मौलिकता में हो इसके बावजूद उसके अंदर ही उसका दम घोंट दिया गया हो तब क्या ....इसके लिए क्या सांथी सौंदराजन दोषी है ....क्या उसका ये दोष है कि उसने देश के पदक जीतने के लिए प्रयास किया ....अगर कोई व्यक्ति देश के पदक जीतने के लिए कोई प्रयास करता है और वो जीत भी जाता लेकिन उससे पदक सिर्फ इसलिए छीन लिया जाता है कि वो द्दिलंगी है तो इसमें उसका क्या दोष....आखिर वो जाए तो कहां जाए ....एक तरफ हम समान व्यवहार की बात करते है इंसानियत की बारे में लंबे चौडे भाषण देते है ....दूसरे का दुखदर्द बांटने की बात करते है ....वहीं दूसरी तरफ कुछ ऐसी चीजे करते है जिन पर हमें हंसी भी आती है और गुस्सा भी.....आज देश की जनता को पता चल गया है कि बहुत से नेता सिर्फ मंचो से शब्दों के गुच्छो बनाकर उन्हे बेवकूफ बनाते है ...और जीतने के बाद या तो वो अपनी तिजोंरिया भरते है या फिर राजनीति में परिवारवाद की फसल तैयार करते है ...उन्हे न तो जनता से मतलब और न ही जनप्रतिनिधि शब्द के अर्थ से ....शायद यही वजह है कि जनता उन्हे चुन रही है जिसे समाज ने हमेशा ही हेय द्ष्टि से देखता आया है ....किन्नर शबनम मौसी इसी का उदाहरण है जो मेयर बनकर लोगों की सेवा कर रही है .... वो मेयर इसलिए नही बन गई कि हमारे यहां के नेता उन्हे समान अधिकार देना चाहते थे बल्कि वो इसलिए मेयर बन गई कि लोगों की जरुरत थी क्योकि वो नेता निकम्मे हो गये थे जिनसे जनता इस बात की उम्मीद लगाए बैठी थी कि वो उनके जनप्रतिनिधि बन कर उनकी समस्याओं का समाधान करेगें.....जब एक किन्नर मेयर बन सकती है तो एक खिलाडी द्दिलिंगी खिलाडी देश के पदक क्यों नही जीत सकती है ....दोष उसका नही बल्कि हमारी व्यवस्था का ...ये कोई उसके हाथ में तो नही कि वो द्दिलिंगी हो या फिर एकलिंगी ....ईश्वर ने जैसा बना दिया वैसा बन गया ....हमारी व्यवस्था में दो के लिए ही जगह है एक पुरुष और एक महिला लेकिन अगर कोई तीसरा भी हो तो वो कहां जाए ...जैसा कि सांथी सौंदराजन के मामले में क्या वो अपने सपनों का गला घोंट दे या फिर ये सोंचकर आत्महत्या कर ले कि वो जिस तरह की है उसके लिए तो इस समाज में कोई व्यवस्था ही नही ....उसके अंदर की हर प्रतिभा तो सिर्फ उसके लिए अभिशाप है क्योंकि वो होकर भी न होने के समान है प्रतिभा होने के बावजूद व्यवस्था इसलिए आपसे पदक छीन लेती है कि आप उसकी व्यवस्था में किए गए इंतजाम में फिट नही बैठते है ....बार इस बात को कहकर मानसिक प्रताडना दी जाती है और आत्महत्या करने के लिए मजबूर करती है ....जैसा कि सांथी सौंदराजन के साथ हुआ ....उसने आत्महत्या की कोशिश की लेकिन उसमें वो सफल नही हो सकी ....अब एक तरह से वो जिंदा लाश है जो जी भी नही सकती और मर भी नही सकती .....एक तऱफ उसके अंदर प्रतिभा है जो कसमसाती है मगर व्यवस्था का आवरण इतना कडक है कि वो उसे भेद नही पाती है ...वो विद्रोह भी नही कर सकती क्योकि उसके जैसे लोगों की संख्या कम है .....जबकि हमारी व्यवस्था में सच का और अच्छाई का उतना महत्व नही है जितना कि बहुमत का .....अब आप ही इस बात का निर्णय करें कि जो हुआ उसके लिए सांथी दोषी है या फिर हमारी व्यवस्था जिनके लिए कोई जगह ही नही ......

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