शुक्रवार, 1 जनवरी 2010



ये कैसी प्रेम की ज्वाला जलाती है जो अंतर्मन


मिली मथुरा तो राधा मिल सकी न फिर कभी मोहन


यही है सत्य जीवन का यहां सब कुछ नही मिलता


कभी झूले नही मिलते कभी मिलता नही सावन

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