शुक्रवार, 1 जनवरी 2010



अश्क हो जाए जो सैलाब तो कोई बात है


रिश्ते हो जाए खुद बेताब तो कोई बात है


जलके हर चीज तो बस खाक हुआ करती है


जलके हो जाए जो मेहताब तो कोई बात है


मैने पन्नों की किताबों तो बहुत देखी है


बिना पन्नों की हो किताब तो कोई बात है


सूरज से दिन तो हर रोज मिला करता है


कभी सूरज से मिले रात तो कोई बात है


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