
अश्क हो जाए जो सैलाब तो कोई बात है
रिश्ते हो जाए खुद बेताब तो कोई बात है
जलके हर चीज तो बस खाक हुआ करती है
जलके हो जाए जो मेहताब तो कोई बात है
मैने पन्नों की किताबों तो बहुत देखी है
बिना पन्नों की हो किताब तो कोई बात है
सूरज से दिन तो हर रोज मिला करता है
कभी सूरज से मिले रात तो कोई बात है

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें