शुक्रवार, 1 जनवरी 2010


नये साल का पहला दिन , हमेशा उन लोगों के लिए खास सौगात लाने वाला होता जिनका पिछला साल अच्छा नही गया ...तो उनके लिए नई उम्मीदों वाला होता है जिनका पिछला साल बहुत अच्छा गया ....क्योंकि जहां हारा खिलाडी नये साल में नयी उर्जा के साथ एक नया इतिहास लिखने का प्रयास करता है वहीं विजेता इतिहास दर इतिहास की पटकथा को लिखने के लिए बेकरार रहता है ....मतलब दोनों लोगों के लिए खुशियां लाने वाला होता है नया साल ....और इस नये साल की शुरुआत भी रायपुर के लोगों ने कुछ इसी तरह से की ....शुक्रवार को नये साल का पहला दिन था ....ऐसे में लोगों ने पिछले साल का हर गम भुलाकर ..खुशियों को दामन में छिपाकर पहुंचे अपने परिवार के साथ नंदनवन ....तेज रफ्तार से भागती जिंदगी से कुछ पल अपने लिए निकालकर लोग अपने लिए इस दिन नंदनवन में जीते दिखे ....शायद ही कभी ऐसा मौका आता हो जब दुनियादारी की जिंदगी को भूलकर लोग अपने परिवार के साथ एक ही थाली में खाने का स्वाद लेते दिखाई पडे ....लेकिन इस दिन ऐसा हुआ....फिर भले ही बहाना नये साल का हो....लोग अपने परिवार के साथ पहुंचे ....हर कोई आज के दिन पूरा जी लेना चाहता था ....बच्चे बूढे और जवान सभी से नंदनवन रहा आबाद.....पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित परिवारों में डस्टबीन की परिभाषा से परिभाषित बुजुर्गों की होठों की मुस्कान इस बात को बयां कर रही थी कि शायद आज वो उन पलों को महसूस कर रहे है जिसके उन्होने जवानी में सपने देखे थे .....गोद में नाती पोते लिए कोई बुजुर्ग उनसे अठखेलियां कर रहे थे तो किसी को इस बात की खुशी थी कि चलो उस बेटे और बहू के पास आज उनके लिए समय तो मिला जिन्हे उन्होने बडी उम्मीदों से पाला था ....वही महिलाएं भी पीछे नही थी वो भी बच्चों के साथ झूले पर बैठकर बच्ची बन गई ....और अपने बडप्पन को भूलकर एक बार वो भी बचपन में चली गई ....ज्यादातर लोग घर से खाना बनाकर लाए थे ....और परिवार के सारे सदस्य एक घेरा बनाकर उस खाने के स्वाद के साथ उस प्रेम का चस्का भी ले रहे थे जो किसी परिवार के लिए अहम जरुरी होता है .....बच्चे भी कहां पीछे रहने वाले उनके लिए ही तो इस तरह के मौके विशेष रुप से होते है .....बच्चे मस्ती में इस कदर सराबोर थे कि उन्हे इस बात का आभाष भी नही था कि उन्हे चोट लग जाएगी ....कोई शेर के बिल्कुल पास पहुंच जाना चाहता था तो कोई चिडियां को हाथों से छूना चाहता था ....इतना ही नही जिस झूले से सिर्फ चार लोग जा सकते थे उस पर एक साथ पचास लोग सवार थे ....ये था लोगों की बेताबी का आलम ....हालांकि इनमें बच्चों की संख्या ज्यादा थी .....लोग नये साल का मजा तो ले रहे थे लेकिन वो कहीं न कहीं इस बात से नाखुश भी थे कि नंदनवन प्रबंधन ने अगर थोडी सावधानी बरती होती तो लोगों को धूल का सामना नही करना पडता .....भारी संख्या में लोगों के आने से धूल का गुबार उठ रहा था .....वैसे भी रायपुर धूल और मच्छर के लिए बदनाम है और इस मामले में वो यहां भी पीछे नही रहा .....वही सुरक्षा व्यवस्था के लिए लगाए गए पुलिसकर्मियों में से कुछ तो अपना फर्ज निभा रहे थे तो कुछ अपने लोगों से व्यवहार कमा रहे थे मतलब वो यहां भी नही चूके आम के आम और गुठलियों के दाम बनाने से ....हालांकि कुल मिलाकर लोगों ने जहां पहले दिन जमकर लुत्फ उठाया वहीं एक बार फिर नये साल में ये सवाल उठकर सामने आया कि कब तो लोगों को सिर्फ नये साल के पहले दिन नंदनवन का ही मुंह ताकना पडेगा ......

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