रविवार, 18 अप्रैल 2010
एक बार फिर ये साबित हुआ कि दौलत से बहुत कुछ खरीदा जा सकता है लेकिन सब कुछ नही ....जीं हां अपने बाप की दौलत और पद के नशे में चूर हरियाणा के राजनेता विनोद शर्मा के बिगडैल बेटे मनु शर्मा को शायद इस बात का इल्म नही था कि उसके बाप की दौलत और उसकी पहुंच में इतना पॉवर नही है कि वो उसके गुनाह की सजा को खरीद सकें .....जेसिका लाल हत्याकांड में भले ही ग्यारह साल बाद ये साफ हुआ हो कि मनुशर्मा अब होटलों में बैठकर शराब की प्यालियों की चुस्की नही लेंगें बल्कि तिहाड की जेल की आबोहवा को चखेंगे....लेकिन इस फैसले के बाद ये बात जरुर साबित हो गई है कि राजनीति को अपने हाथों की कठपुतली बनाकर उसको अपने मतलब के लिए यूज करने वालों के हाथ अभी भी इतने लंबे नही हुए है कि वो इंसाफ को अपने मनमुताबिक ढाल सकें ....१९ अप्रैल १९९९ में ये वारदात टैमरिड कोर्ट में घटी थी ....जहां पर जेसिका शराब परोसा करती थी ....राजनीति की काली कमाई में पले बढे मनु शर्मा इतना बिगडैल हो गया कि उसे न पसंद नही आता था ....और यही वजह रही है कि जब जेसिका ने उसे शराब परोसने से मना कर दिया तो उसने अपने दोस्तों को अपनी रंगबाजी औऱ अपने बाप का धौंस दिखाने के लिए जेसिका को गोली मार दी ....मामला कोर्ट गया लेकिन बडी अजीब बात कि सत्र न्यायालय ने उसे बाइ इज्जत बरी कर दिया .....और एक बार फिर ये लगने लगा कि दौलत और उंचे पद पर बैठे हुए लोगों के लिए सब कुछ माफ है .....लेकिन अपनी सनसनीखेज खबरों के लिए बदनाम हो चुके मीडिया इस बात को पचा नही पाया खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया ....और उसने मनु शर्मा के खिलाफ एक मुहिम छेड दी ....मामला हाइकोर्ट पहुंचा और हाइकोर्ट ने इस मामले में मनु शर्मा को उम्रकैद की सजा सुनाई .....जो उम्मीदें सत्र न्यायालय के फैसले के बाद दम तोड रही थी ....हाइकोर्ट के फैसले के बाद ऐसा लगा कि उन्हे एक बार फिर से सासों ने साथ दे दिया है और फिर वो खडी हो गई पूरे दम खम से इंसाफ मांगने के लिए .....हालांकि इस मामले में जिस तरह से बहुत से लोग बयान देने की बात से मुकर गये या फिर जो लोग वहां थे उन्होने भी ये कह दिया कि उन्होने कुछ देखा नही है ....उससे ये बात तो साफ हो गई है कि इंसाफ सभी चाहते है लेकिन उस इंसाफ की कीमत कोई नही चुकाना चाहता है क्योंकि ये लोग सोंचते है कि इसमें जेसिका को गोली मारी गई उनके किसी घर वाले को नही फिर क्यों वो फालतू झमेले में पडे .....हालाकि ऐसे लोग ये भूल जाते है कि उनकी ये चुप्पी सिर्फ एक चुप्पी नही है कि बल्कि ये इस बात का इशारा है कि आप जो कर रहे है करते जाइये हम कुछ नही बोलेगें ....क्योंकि ये हमे स्वीकार है......खैर फिर से आते है हम इंसाफ की बात पर ....मनु शर्मा ने जब ये देखा मीडिया ने एक मुहिम छेड दी है और जिन सबूतों को पर्याप्त न मानकर सत्र न्यायालय ने उसे बरी कर दिया था ....मीडिया की मुहिम के बाद उन्ही सबूतों को पर्याप्त सबूत मानकर हाइकोर्ट ने मनु शर्मा को उम्रकैद की सजा सुना दी ....मनु शर्मा ने सोंचा कि क्यों न मीडिया की ताकत का इस्तेमाल वो अपने आपको बेगुनाह साबित करने के लिए करे ....और इसके बाद उसने अपने बाप की दौलत को इंडिया न्यूज चैनल आज समाज अखबार और इंडिया न्यूज पत्रिका को खोलने में लगाया ....वो सोंच रहा था कि चैनल अखबार पत्रिका खोलकर वो मीडिया लॉबी में शामिल हो जाएगा ....और जो तपिश मीडिया ने उसके खिलाफ छेड रखी है वो शांत हो जाएगी .... लेकिन अभी भी ऐसा नही हुआ है कि मीडिया अपना पूरा का पूरा जमीर बेंचकर सिर्फ खाने खिलाने में ही लग जाए ....और वही हुआ जिसका देश के तमाम उन लोगों को इंतजार था जो रईसजादों के शौक का शिकार होते है ....१९ अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने अपने अहम फैसले में मनु शर्मा की वो सजा बरकरार कर रखी जो हाइकोर्ट ने सुनाई थी .....इस फैसले के बाद एक बार फिर से उन उम्मीदों को संबल मिला होगा जो पैसे पहुंच और रईसजादों के शौक का शिकार होकर समाज से घुटघुट कर मरती रहती है ....इंसाफ के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाती है लेकिन न्याय की प्रक्रिया पैसे की धार के आगे इतनी लंबी हो जाती है कि उनकी जिंदगी भी छोटी पड जाती है .....यहां पर ये जरुर कहना चाहूंगा कि मॉडल जेसिका लाल हत्या कांड में इंसाफ इसलिए मिल सका क्योंकि न सिर्फ ये हाईप्रोफाइल मर्डर बन चुका था बल्कि ये मीडिया की नजर में था लेकिन आज भी लाखों ऐसे खून से रंगे हाथ है जिन्होने अपने शौक के लिए कई घरों के चिराग बुझा दिये इसके बावजूद उन हाथों में हथकडियां नही है बल्कि शराब की चुस्कियां थामे वो ऐश कर रहे है औऱ खुलेआम घूम रहे है वहीं जो लोग इंसाफ चाह रहे है वो कोर्ट की दहलीज के चक्कर लगा लगा कर अपनी जिदंगी के आखिरी मोड पर पहुंच गये है लेकिन इंसाफ है कि मिलता ही नही क्योंकि जब भ्रष्टाचार इस कदर बढ जाए कि हर कहीं उंचे ओहदे पर बैठा आदमी ये सोचने लगे कि किस तरह से पैसा बनाया जाए तो ये कैसे सोंचा जा सकता है कि न्यायापालिका में बैठे लोग इमानदार ही होंगे .......भला ऐसा होता तो क्या किसी को इंसाफ मिलने में पचासों साल लग जाते ...हालाकि अभी भी उम्मीद बनी है कि आज भी ऐसे लोग न्यायापालिका में है जो इंसाफ के तराजू को बराबर रखते है और इसी का परिणाम है कि मनु शर्मा को उम्र कैद की सजा बरकरार रखी गई .....ये किरण है उन लोगों के लिए जिनकी उम्मीद बूढी हो चुकी थी और दम तोड रही थी
सोमवार, 15 मार्च 2010
शनिवार, 13 मार्च 2010

महिलाओं के आरक्षण की बात अभी राज्यसभा से ही आगे बढ पाई थी कि सभी ओर हाय तौबा मच गई .....किसी को बच्चों की चिंता सताने लगी तो किसी को खुद की .....स्वतंत्रता सबको अच्छी लगती है ...और ये बात सभी पर लागू होती है बात चाहे पुरुषों की हो या फिर महिलाओं की ....लेकिन लगता है पुरुष वर्ग में कुछ लोग ऐसे है जो इसे अपनी बपौती मानते है ....हालांकि इसमें उनका कोई दोष नही क्योंकि विस्तार वहीं होता है जहां जगह होती और उनकी दिल दिमाग इस कदर सिकुडे हुए है कि वो दकियानूसी के बाहर जाकर कुछ सोच ही नही सकते ....दूसरी बात जब कोई घटना परपंरागत लीक से हटकर होती है तो ऐसे लोग या फिर समाज जल्दी से उसे स्वीकार नही कर पाता ....ऐसे लोग पहले प्रतिकार करते है और जब देखते है कि धीरे धीरे उस बात की ओर लोग जाने लगे है तो वो उसे स्वीकार कर लेते है ....इन्ही सिकुडे हुए दिमागी लोगों के प्रतिनिधि है कल्बे जव्वाद ....जिन्होने एक आमसभा में ये कहा है कि महिलाएं अच्छे नेताओं को पैदा करने के लिए है न कि खुद नेतागिरी करने के लिए .....शायद वो ये बात भूल गए है कि बच्चे सिर्फ अकेले औरत ही नही पैदा करती है बल्कि उसमें पुरुष भी सहभागी होता है ....मतलब बच्चे में मां बाप दोनों के गुण होते है ....और ऐसे में जब तक कल्वे जव्वाद जैसे लोग होंगे तब तक अच्छे नेता नही पैदा हो सकते क्योंकि एक नेता सिर्फ अपने परिवार को प्रभावित नही करता बल्कि वो देश के लाखों लोगों को प्रभावित करता है ...एक बात और कल्वे जव्वाद इस बात को अच्छी तरह से जानते है कि कोई महिला अच्छे नेता पैदा कर सकती है लेकिन ये बात भूल जाते है कि एक महिला घर की इज्जत को दहलीज के पार ले जाकर उसका सडक पर मजाक भी बना सकती है ....अभिषेक बच्चन की जब शादी हो रही थी तब अभिषेक के साथ शादी होने की बात इन्ही के खानदान की बहू जाह्नवी ने कही थी वो इसलिए नही कि वास्तव में शादी हुई थी बल्कि इसलिए कि इतने बडे सितारे के बेटे के साथ अपना नाम जोडकर उथली पब्लिसिटी पा लें ....मैं ये बात इसलिए कह रहा हूं कि जव्वाद साहब ये अच्छी तरह से समझ लें कि अच्छा कोई पेट से नही बल्कि संस्कारों से बनता है ....और संस्कार पेट के अंदर नही बल्कि बाहर सिखलाये जाते है ....जव्वाद जैसे लोग उन लोगों में है जो दूसरे की पत्नियों को देखकर तो उनकी हर अदा पर चटखारे मारने के बेकरार रहते है लेकिन अपनी बीवी को सात पर्त के अंदर रखने की ख्वाहिश रखते है ....जव्वाद मुस्लिम समुदाय से है और मुस्लिम समुदाय हमेशा से ही महिलाओं की स्वतंत्रता का विरोध करता रहा है ....उसने हमेशा ही औरत को पर्दानसीन एक चीज समझा है न कि एक एक ऐसा अक्स जिसमें भावनाएं है ....क्योंकि अगर उसने ऐसा समझा होता तो जव्वाद जैसे लोग ये बयान न देते कि महिलाएं अगर राजनीति में आना चाहती है तो वो पहले इस्लाम धर्म छोड दे उसके बाद राजनीति में जाएं.....शायद इस्लाम धर्म को जव्वाद जैसे लोगों ने अपने घर की बकरी समझकर रखा कि जब चाहेगें तो वो उसको दुहकर अपना स्वार्थ सिद्द कर लेगें और जब चाहेंगें तो उसे खुला छोड देंगें....जव्वाद जैसे लोग उन लोगों में से है जिनका कोई धर्म नही होता बल्कि ये धर्म को अपना हथियार बनाकर अपनी हार को छुपाना चाहते है ....अभी तक अपनी हर आवाज को महिलाओं के लिए कानून बनाने वाले ये लोग अब इस बात से डर रहे है कि कहीं संसद में बैठकर ये महिलाएं उनके लिए कानून न बनाने लगी ....क्योंकि अगर महिलाओं को लोकसभा और विधान सभा में आरक्षण मिल गया तो न सिर्फ महिलाओं का संसद में बोलबाला हो जाएगा ....बल्कि बहुत सी महिलाएं पर्दे से बाहर भी आ जाएगी और यही बात जव्वाद जैसे लोगों का पेट खराब कर रही है .... अब जरा उन नेताओं की बात कर लेते है जो आरक्षण पर अपनी भृकुटियां ताने हुए है और नही चाहते कि ये आरक्षण कानून बने ...इनमें मुलायम लालू और शरद यादव है .....ऐसा नही है कि आरक्षण के बाद महिलाएं इनसे रोटी बनवाऐंगी या फिर झाडू लगाऐगीं ...बल्कि डर इन्हे इस बात का है कि कहीं इनकी राजनीति की दुकानदारी की बिक्री धीमी न हो जाए .....कई ऐसी पार्टियां जिनसे एक भी महिला जीतकर संसद नही पहुंची ....साथ ही बहुत से ऐसे भी नेता है कि जो एक ही सीट से हर बार जीतकर संसद और विधान सभा में पहुंचते है ....ऐसे लोग महिलाओं के आरक्षण से नही बल्कि अपनी राजनीतिक रोटी के बासी होने से डर रहे है ...और यही वजह हैकि ये लोग इस बिल का विरोध कर रहे है .....
शनिवार, 16 जनवरी 2010
अक्सर मुझे इस बात पर खीज होती है कि घर वाले मुझे कोई ऐसा निर्णय नही लेने देते जिसमें रिस्क हो ....कभी कभी सोंचता हूं कि घर वाले चाहते है कि मैं भी उसी एक सामान्य व्यक्ति की तरह जिंदगी गुजारु जैसे ज्यादातर लोग गुजारते है ...मैं मेरा परिवार एक छोटी सी नौकरी ...और दिन भर की दिनचर्या खाया पिया परिवार का हाल जाना और सो गया ....लेकिन ये मेरी फितरत में शुरु से ही नही रहा....क्योंकि मुझे लगता है कि मानव जीवन सिर्फ बच्चे पैदा करने और सिर्फ अपने परिवार तक ही सीमित रहने के लिए नही हुआ है ...बल्कि और भी बहुत कुछ जिसे करने के लिए ये जन्म हुआ है ......लेकिन फिर कभी सोचता हूं कि मेरी मां जो मुझे ऐसा करने से रोकती है वो इसलिए नही रोकती कि वो मेरी प्रोग्रेस नही चाहती बल्कि वो इसलिए कि वो मुझसे इतना प्यार करती है कि वो नही चाहती है कि मेरा कोई भी ऐसा कदम हो जाए जिससे मुझे परेशानी हो ....शायद उसका दिल मेरे दिल कहीं ज्यादा उस समय दुखी हो जाता है जब वो मुझे परेशान देखती है ...ये मुझे नही पता कि उसने मुझे कैसे पाला है क्योंकि शायद तब मैं इतना समझदार नही था लेकिन वो जानती है कि मुझे इतना बडा करने में उसे क्या मुसीबतें उठानी पडी है ...तभी वो मुझे हमेशा ऐसा कुछ करने से रोक देती है जिसमें कोई रिस्क हो ....मुझे पता है कि अगर मैं प्रोग्रेस करुंगा तो शायद ही उससे ज्यादा किसी को खुशी हो लेकिन वो नही चाहती है कि इस खुशी के लिए मुझे दुख के आसूं रोना पडे वो चाहती है मेरी खुशी लेकिन उन आसुओं के साथ जो सिर्फ और सिर्फ खुशी के आंसू हो .....मैं जानता हूं वो हमेशा मेरे साथ नही रहेगी क्योंकि यहां कोई अमर नही है ....वो एक दिन मुझे छोडकर चली जाएगी लेकिन वो इस तरह से जाना चाहती है कि उसे इस बात की फ्रिक न रहे कि उसका लाल परेशानी में है और बेरोजगार है ....शायद ये मां ही तो होती है जो अपने बेटे से प्यार करती है ....उस मां के चरणों में कोटि कोटि प्रणाम
रविवार, 10 जनवरी 2010

सपनों को बुनने में जितनी मेहनत लगती है... उससे कहीं ज्यादा दर्द की टीस उस वक्त होती है जब वो सपना टूटकर बिखर जाता है ....और ये दर्द तब और बढ जाता है जब इस सपने को तोडने में किसी अपने का हाथ होता है ....हम भारतीयों की ये कमजोरी कहें या फिर इंसान की फितरत कि वो किसी चीज को तब तक याद रखता है जब तक वो चीज सफलता के फलक पर चमकती है ....जैसे ही वो वहां से उतरी उन लोगों की नजरों में ही वो धूमिल हो जाती है जिसे कभी वो ही लोग सबसे चमकदार कहते थे...शायद आपको याद नही होगा ....लेकिन अतीत के पन्नों से भी कभी कभी भविष्य की एक ऐसी इमारत बन जाती है जो कालजयी हो जाती है ....जी हां मैं बात कर रहा हूं सांथी सौंदराजन की जिन्होने भारत के लिए एशियाई खेलों में रजत पदक जीता .... लेकिन द्दिलिंगी होने के आरोपों के बाद उनसे पदक छीन लिया गया ...इतना ही इसके बाद उनकी कोई खोज खबर भी नही ली गई .... सांथी ने विपरीत परिस्थियों के होने के बावजूद अपनी गरीबी से लडकर वतन का गौरव बढाने के लिए दिन रात मेहनत करके इस बात का सपना संजोया था कि वो देश के लिए पदक जीत कर न सिर्फ देश का नाम करे बल्कि खुद पर भी देश का गौरब बढाने के लिए फक्र कर सकें लेकिन इससे पहले कि ये सपना सच होकर सामने आता, सपना टूटकर बिखर गया ...जो नेता बडे बडे बुद्दिमान बडे बिचारक और दुनिया के महान लोग जो इस बात को कहते हुए अघाते नही है कि मतलब के लिए ही सब कुछ मत करो उन्ही के सामने सांथी की हालत सोने के अंडे वाली मुर्गी से गधे के गोबर वाली हो गई लेकिन सभी मौन रहे ....ये ठीक है कि सांथी सौंदराजन पर द्दिलिंगी का आरोप लगा लेकिन इसमें सौंदराजन क्या कसूर ....क्या वो देश के लिए पदक जीतने का सपना नही संजो सकती थी ....क्या उसे इस बात का अधिकार नही है कि अपने देश का नाम उंचा कर सके .....बडी बडी किताबों और ग्रंथो में कहा गया है कि इंसान की इंसानियत के लिए और देश के नागरिक के लिए उसमें देश का गौरव बढाने का गुण जरुर होना चाहिए..... ये विकसित नही किया जा सकता बल्कि उसकी मौलिकता में होता है .....और जब किसी की मौलिकता में हो इसके बावजूद उसके अंदर ही उसका दम घोंट दिया गया हो तब क्या ....इसके लिए क्या सांथी सौंदराजन दोषी है ....क्या उसका ये दोष है कि उसने देश के पदक जीतने के लिए प्रयास किया ....अगर कोई व्यक्ति देश के पदक जीतने के लिए कोई प्रयास करता है और वो जीत भी जाता लेकिन उससे पदक सिर्फ इसलिए छीन लिया जाता है कि वो द्दिलंगी है तो इसमें उसका क्या दोष....आखिर वो जाए तो कहां जाए ....एक तरफ हम समान व्यवहार की बात करते है इंसानियत की बारे में लंबे चौडे भाषण देते है ....दूसरे का दुखदर्द बांटने की बात करते है ....वहीं दूसरी तरफ कुछ ऐसी चीजे करते है जिन पर हमें हंसी भी आती है और गुस्सा भी.....आज देश की जनता को पता चल गया है कि बहुत से नेता सिर्फ मंचो से शब्दों के गुच्छो बनाकर उन्हे बेवकूफ बनाते है ...और जीतने के बाद या तो वो अपनी तिजोंरिया भरते है या फिर राजनीति में परिवारवाद की फसल तैयार करते है ...उन्हे न तो जनता से मतलब और न ही जनप्रतिनिधि शब्द के अर्थ से ....शायद यही वजह है कि जनता उन्हे चुन रही है जिसे समाज ने हमेशा ही हेय द्ष्टि से देखता आया है ....किन्नर शबनम मौसी इसी का उदाहरण है जो मेयर बनकर लोगों की सेवा कर रही है .... वो मेयर इसलिए नही बन गई कि हमारे यहां के नेता उन्हे समान अधिकार देना चाहते थे बल्कि वो इसलिए मेयर बन गई कि लोगों की जरुरत थी क्योकि वो नेता निकम्मे हो गये थे जिनसे जनता इस बात की उम्मीद लगाए बैठी थी कि वो उनके जनप्रतिनिधि बन कर उनकी समस्याओं का समाधान करेगें.....जब एक किन्नर मेयर बन सकती है तो एक खिलाडी द्दिलिंगी खिलाडी देश के पदक क्यों नही जीत सकती है ....दोष उसका नही बल्कि हमारी व्यवस्था का ...ये कोई उसके हाथ में तो नही कि वो द्दिलिंगी हो या फिर एकलिंगी ....ईश्वर ने जैसा बना दिया वैसा बन गया ....हमारी व्यवस्था में दो के लिए ही जगह है एक पुरुष और एक महिला लेकिन अगर कोई तीसरा भी हो तो वो कहां जाए ...जैसा कि सांथी सौंदराजन के मामले में क्या वो अपने सपनों का गला घोंट दे या फिर ये सोंचकर आत्महत्या कर ले कि वो जिस तरह की है उसके लिए तो इस समाज में कोई व्यवस्था ही नही ....उसके अंदर की हर प्रतिभा तो सिर्फ उसके लिए अभिशाप है क्योंकि वो होकर भी न होने के समान है प्रतिभा होने के बावजूद व्यवस्था इसलिए आपसे पदक छीन लेती है कि आप उसकी व्यवस्था में किए गए इंतजाम में फिट नही बैठते है ....बार इस बात को कहकर मानसिक प्रताडना दी जाती है और आत्महत्या करने के लिए मजबूर करती है ....जैसा कि सांथी सौंदराजन के साथ हुआ ....उसने आत्महत्या की कोशिश की लेकिन उसमें वो सफल नही हो सकी ....अब एक तरह से वो जिंदा लाश है जो जी भी नही सकती और मर भी नही सकती .....एक तऱफ उसके अंदर प्रतिभा है जो कसमसाती है मगर व्यवस्था का आवरण इतना कडक है कि वो उसे भेद नही पाती है ...वो विद्रोह भी नही कर सकती क्योकि उसके जैसे लोगों की संख्या कम है .....जबकि हमारी व्यवस्था में सच का और अच्छाई का उतना महत्व नही है जितना कि बहुमत का .....अब आप ही इस बात का निर्णय करें कि जो हुआ उसके लिए सांथी दोषी है या फिर हमारी व्यवस्था जिनके लिए कोई जगह ही नही ......
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