रविवार, 17 अप्रैल 2011
अन्ना हजारे की भ्रष्टाचार के खिलाफ लडाई का अभी प्रारांभिक चरण ही लोगों के सामने आया था ...और इसमें जीत भी अन्ना को हासिल हुई थी ....लेकिन ये जीत भला उन राजनेताओं को कैसे पच सकती थी जो कई सालों से देश की एक सौ इक्कीस करोड जनता को बडी स्मार्ट तरीके से बेवकूफ बनाते आ रहे थे ....राजनेताओं का सिद्धांत है कि महापुरुषों को मानों मगर उनकी न मानों ....इससे कई फायदे है ...उनको मानने से उन लोगों को समर्थन मिलेगा जो उन्हे मानते हैं साथ ही वोट भी ....लेकिन अगर उनकी मानेंगें तो न भ्रष्टाचार कर पाऐंगे न ही सफेद कपडों में सज्जन पुरुष बनकर अय्याशी और न ही स्मार्ट तरीके से वादों के पिटारे के बल पर लोगों को बेवकूफ बना पाऐंगें....इसलिए उनको तो मानों मगर उनकी न मानों सबसे अच्छा सिंद्दांत है ....शायद यही वजह है कि गांधी को अपना आदर्श मानने वाली और उनकी नाम को अब तक भुना रही कांग्रेस सरकार के नेता मंत्री अन्ना के अनशन खत्म होते ही इस तरह से अन्ना पर उनके आदोंलन पर बयान करने लगे जैसे वो इसी ताक में थे कि किस तर ह से जल्द से जल्द ये आंदोलन खत्म हो और वो अपने बयानों से अन्ना को धराशायी कर दें.....राजनेताओं को इस बात का पता है कि जनता कब किस तरह का रिएक्शन करती है ....क्योंकि वो कई सालों से इस जनता को बेवकूफ बना रहे है तो अन्ना और दूसरे लोगों से कहीं ज्यादा नेता ये समझते है कि जनता कब क्या कर सकती है ....उन्हे पता है कि देश की जनता कुंभकर्ण की तरह है कि अगर वो जाग गई तो इस तरह से हाथ में सोंटा लेकर दौडाएगी कि उनकी लाल लगोंटा तक नही बचेगा....इसलिए जब आंदोलन शुरु हुआ तो इसे इतना गंभीर नही लिया गया लेकिन जब जनता जाग गई और अन्ना को अपार समर्थन मिला तो नेताओं को भी ऐसा लगा कि अब ये आदोंलन अन्ना का आदोलन नही बल्कि जनआंदोलन बनता जा रहा है ...इसलिए तब किसी भी नेता ने अपनी पैनी जुबान नही खोली और न ही सरकार ने इस आंदोलन पर ज्यादा कुछ नसीहत दी हालांकि अंदर ही अंदर रणनीति बनती रही और सरकार ने सिर्फ चार दिन में ही वो सारी मांग माने ली जो आंदोलनकारियों ने की थी ......शायद नेता भी जानते थे कि जैसे ही आंदोलन खत्म होगा जनता अपने फिर अपने उसी पुराने ढर्रे में आ जाएगी ...और वो अपना पुराना काम शुरु कर देंगें....और उन्होने किया भी वही ....आंदोलन खत्म होते ही सभी ओर से बयानों की बौछार आने लगी ....और सभी नेताओं का यही मानना था कि अन्ना ने जो किया वो सही नही था ....कुछ लोग सीधे कह रहे थे तो कुछ लोग अपना वोट बैंक बचाकर .......कपिल सिब्बल ने जहां जनलोक पाल विधेयक को ही नकार दिया वही दूध के धुले आडवाडी ने कहा कि सभी नेता ऐसे नही होते है ....हां आडवाडी आप तो बिल्कुल नही क्योंकि नेताओं के पास एक हथियार सबसे कारगर है कि अगर कोई मामला सामने आ जाए तो कह दो ये विपक्षी पार्टी की साजिश है और ये उन्हे बदनाम करने के लिए किया जा रहा है ....शायद आपका तहलका वाले मामले में भी यही कहना होगा......
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