
पहले मदनवाडा में नक्सलियों ने एस पी प्रदीप चौबे सहित ३५ जवानो को मौत के घाट उतार दिया....इसके बाद अभी सरकारी बयान की आंच ठंडी भी नही हुई थी कि फिर से नक्सलियों ने ये साबित कर दिया कि सरकार सिर्फ बातों के बतासे बनाती है न कि कारगर कारवाई यही वजह थी कि चिंतलनार में नक्सलियों ने देश का सबसे बडा हमला करते हुए ७८ जवानों को काल के गाल में पहुंचा दिया....इस हमले के बाद केंद्र सरकार को इस बात का अहसास हुआ छत्तीसगढ नक्सलियों से जूझ रहा है ...इसके बाद कई बयान आए चिंदबरम भी छत्तीसगढ आकर शहीदों के प्रति संवेदना जताई ...वही छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने एक बार फिर वही राग अलापते हुए सिर्फ ये कहकर अपने फर्ज से इति श्री कर ली कि नक्सली की ये कायराना हरकत है और इसे किसी भी कीमत पर नही बर्दास्त किया जाएगा ....लेकिन वही हुआ जिसका अंदेशा था नक्सलियों ने इतनी बडी घटना के बाद एक बार फिर से सरकार को ठेंगा दिखाते हए गादीरास में ब्लास्ट करके एक बस को उडा दिया ....और सरकार ने फिर वही रटा हुआ जवाब दोहराया कि अब रणनीति बदलने की जरुरत है ....इतना ही नही इस बार पुलिस जवानों के साथ नक्सलियों ने आम लोगों को भी निशाना बनाया ॥लेकिन सरकार सिर्फ रणनीति की बात करती रही और इस हवा को बल मिला कि अब हवाई हमले से ही नक्सलियों से निपटा जा सकता है ...मुख्यमंत्री से लेकर चिंदबरम को भी यही लगने लगा कि अब नक्सलियों के सामने कोई भी रणनीति काम नही कर रही है ....इसलिए अब केवल आखिरी विकल्प हवाई हमला है ....लेकिन मुख्यमंत्री और पी चिंदबरम ये भूल गए कि जो लोग छत्तीसगढ में नक्सली से निपटने के लिए तैनात है उन्हे इतना तक नही मालूम है कि नक्सलियों के कंमाडर कौन है और जो लोग नक्सली है वो कौन है ...खुफिया तंत्र इस हालत में है कि उसे पता ही नही चलता कि नक्सली कब हमला करने वाले है ....इतना ही नही जो सुरक्षा बल दंतेवाडा बस्तर सुकमा नारायणपुर पंखाजूर जैसे इलाके में तैनात है उन्हे ये नही मालूम कि आखिर नक्सली है कौन ....मतलब अगर नक्सली उनके सामने आ भी जाए तो वो आम आदमी और नक्सली में अंतर कर पाने में असमर्थ है ....ऐसे में किस पर हवाई हमला किया जाएगा निर्दोष लोगों पर जो पहले से ही सरकार और नक्सली के बीच पिस रहे है नक्सलियों के साथ रहे तो सरकार पीसती है और सरकार का समर्थन करें तो नक्सली मौत के घाट उतारते है .....अब बेचारे आम आदमी जाए तो कहां जाए ......नक्सलियों से निपटने के लिए तरह तरह की बातें हो रही है लेकिन ये बात अभी तक नही हुई कि आखिर ये नक्सलवाद पनपा क्यों .....ये सही है कि आज नक्सलवाद जिस उद्देश्य को लेकर पनपा था वो कही पीछे छूट गया है लेकिन क्या उस समस्या का खात्मा हो पाया है जिसकी वजह से ये वाद पनपा था ....शायद नही ...जिन आदिवासियों के लिए ये राज्य बना था उन्ही बस्तर के आदिवासियों को ये नही मालूम है कि आखिर बीपीएल कार्ड होता क्या है .....जबकि छत्तीसगढ सरकार ये ढिढोंरा पीट रही है कि वो हर गरीब की भूख मिटाने के लिए एक रुपये में चावल मुहैय्या करा रही है....इतना ही नही लोगों को उन राजनेताओं के नाम नही मालूम है जो इस बात में कहने से पीछे नही हटते कि उनका अपना जनाधार है......वहां के लोगों की अपनी दुनिया है जिसमें न तो चकाचौंध है और न ही सरकार की योजनाओं का लाभ ....किसी तरह वो अपने पेट की भूख मिटाते है और अपनी गरीबी में ही मस्त रहते है.....आज सरकार नक्सलियों से क्यों नही निपट पा रही है क्योंकि वो इन गरीबों के मानसिकता में अपनी जगह नही बना पाई उन्हे नही पता है कि सरकार क्या है शायद यही वजह है कि नक्सली इन सीधे साधे लोगों को बरगलाकर सरकार के खिलाफ इस्तेमाल करते है .....ये बात तो सिद्द हो गई है कि नक्सलवाद अपने मूल उद्देश्य से भटक गया है....और ये भी साफ है कि नक्सलवाद को जो लोग हैंडल कर रहे है वो कहीं न कही अपना मतलब साधने के लिए सीधे साधे आदिवासियों को बरगलाकर इस आंधी में झोंक रहे है क्योंकि सुरक्षाबल की गोली का निशाना ये बडे नेता नही बल्कि वो युवा आदिवासी होते है जिन्हे ये भी नही मालूम कि जो लडाई वो लड रहे है आखिर उसका उद्देश्य क्या है .....इसलिए अगर सरकार को ये लडाई जीतनी है तो वहां रहने वाली जनता का पहले विश्वास जीतना होगा तभी असली मायने में ये लडाई जीती जा सकेगी वरना हर हमले निर्दोष लोग ही मारे जाऐंगे क्योंकि नक्सलियों की कोई पहचान तो है नही इसलिये जो दोषी होगें वो आम आदमी बन जाऐंगे और जो बेकसूर होगे वो फिर से सुरक्षाबलों की गोली का निशाना बनेगें......

सर आपने इन शब्दों में इतना सुंदर संवेदना जताई है कि कहने को शब्दों नही है बस इतना ही कहूंगा बहुत खूब
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