सोमवार, 31 मई 2010
नक्सली अब आम आदमी को निशाना बना रहे है ....लेकिन सवाल है आखिर क्यों ....आखिर नक्सली चाहते क्या है ....क्या उनका जो तरीका है वो जायज है ...अगर वो सरकार की नीतियों से खुश नही है तो इसकी कीमत आम आदमी की जान लेकर क्या वो इसकी कीमत आम आदमी से वसूल करेंगें... क्या उन्होने जो तरीका अपना रखा है उससे वो अपने मकसद को पा लेगें ....आखिर कहां पर रुकेगी ये जंग ....नक्सली जो कि सरकार की नीतियों की खिलाफत करके अपना साम्राज्य स्थापित करना चाहते है ....ये लग रहा है उनके तरीके को देखकर ....नक्सलबाडी से कानू सान्याल का चलाया ये आंदोलन अब अपने उद्देश्य से भी भटक चुका है और इसको जो लोग चला रहे है उनका भी कोई मकसद नही है ....क्योंकि ये लडाई शुरु हुई थी आम आदमी के लिए ....लेकिन आज आम आदमी को ही इसमें निशाना बनाया जा रहा है ....मिदनापुर में ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस में हादसा करके आखिर नक्सलियों ने क्या हासिल कर लिया ....क्या नक्सली सिर्फ अपनी ताकत का अहसास कराने के लिए आम आदमी का खून पर खून किये जा रहे है ....शायद जिस तरह से उन्होने ताडमेटला और मिदनापुर में घिनौना काम किया है उससे तो यही लगता है ....तो क्या सिर्फ वो यही चाहते है कि सरकार को इस बात का अहसास हो जाए कि वो इतने ताकतवर है कि वो कहीं भी किसी भी आम आदमी को निशाना बना सकते है ....शायद ये ताकत नही बल्कि ये कायरता है क्योंकि आम आदमी तो वैसे भी बेचारे बिना मरे ही मरा हुआ है ....देश में प्याप्त भ्रष्टाचार महगाई और कहीं भी बिना पहुंच के सुनवाई न होना ...ऐसे बहुत से कारण है जो ये बताते है कि आम आदमी तो जिंदा रहकर भी मरा जा रहा है ....अगर उसके इस समस्या का समाधान होता तो तब तो नक्सली आदोंलन को कहा जाता कि ये आंदोलन आम आदमी के हक के लिए लडा जा रहा है ....लेकिन यहां उसके हक की लडाई नही बल्कि उससे ही जीने का हक छीना जा रहा है ....नक्सलियों की घोर दुश्मनी होती है सुरक्षाबलों से और नक्सलियों ने अब तक इन्ही लोगों को निशाना बनाया है ...लेकिन वो नक्सली नेता जो इस बात का राग अलापते है कि गरीब लोगों को शोषण हो रहा है और अमीर लोग और अमीर बनते जा रहे है ...बेगुनाहों को मारकर खुद पर फक्र करने वाले नक्सलियों को क्या ये पता नही है कि जो जवान सीआरपीएफ पुलिस पैरामिलिट्ररी फोर्स या फिर किसी भी तरह की सुरक्षाबल की नौकरी करते है ...वो किसी अमीर घराने के नही बल्कि किसी गांव के या तो गरीब घराने से होते है या फिर मिडिल क्लास से ....मैं उन जवानों की बात कर रहा हूं जो सिपाही होते है ....और अगर कहीं पर मारे जाते है तो सबसे ज्यादा सिपाही ही मारे जाते है ....क्योंकि उनमें कुछ कर गुजरने का सपना होता है ....ये जवान गांव में रहते है ...किसानी करते है ...साथ ही पढाई भी करते है जब हाईस्कूल या फिर इंटर हो जाते है तो इनका ख्वाब होता है कि इनकी नौकरी लग जाए ....और इनके लिए एक ही सरकारी नौकरी बचती है सुरक्षाबल की ....मां बाप भी चाहते है कि अगर बेटे की सरकारी नौकरी लग जाएगी ...तो गांव में किसी से कहने में ये फक्र होगा कि उनका बेटा भी सरकारी मुलाजिम है ....इसके लिए घर वाले क्या नही करते ....यहां तक की घर में जो जानवरों का दूध होता है जिससे कई घरों में खर्चा भी चलता है उससे दूधिये को न देकर बेटे को पिलाते है ....जिससे वो खूब हट्टा कट्टा हो जाए ....उसे रोजाना सुबह दौडाते है ...खुद नही खाते है लेकिन बेटे का खाने पीने का ध्यान रखते है ...क्योंकि सुरक्षाबल की नौकरी के लिए हट्टा कट्टा शरीर भी होना चाहिए ....अगर बेटा भर्ती देखने जाता है तो उसके खर्चे के लिए दूसरे से उधार लेकर उसे खर्चा पानी दिया जाता है ...इस उम्मीद से हो सकता है इस बार भर्ती में उसका सेलेक्शन हो जाए ....इतना ही नही भ्रष्टाचार की जडें तो हर जगह है ....इसलिए इस बात के लिए अगर कहीं पैसे की जरुरत पडे तो पैसे की कमी न हो ....खेत बेंचकर पैसे की जुगाड भी करते है ....क्योंकि अब जो वास्तव में किसान है उसके पास पैसे रहते ही नही क्योंकि उसकी पूरी खेती ही उधार पर होती है और जैसे ही अनाज घऱ पर आता है बेंचकर वो सबका हिसाब चुका देता है और फिर से ठन ठन गोपाल हो जाता है ....बेटे की नौकरी के लिए सब कुछ करते है और सोंचते है किसी तरह बेटे की नौकरी लग जाए बाद में तो सब ठीक ही हो जाएगा कितनी बडी उम्मीद होती है ...है बेटे से ....क्या नक्सली उस उम्मीद को समझते है ....और अगर नही समझते है तो वो आम आदमी की लडाई नही बल्कि अपने स्वार्थ की जंग लड रहे है ....और अगर समझते है तो फिर वो कैसे इस नरसंहार को कर रहे है ....क्या उन्हे नही पता कि जिस एक उम्मीद के चारों और कई जिंदगियां ये सोंचकर चक्कर लगाती रहती है कि उस उम्मीद से हर समस्या हल हो जाएगी और उनकी जिंदगी आराम से कट जाएगी जब वो उम्मीद ही खत्म हो जाती है तो उन लोगों पर क्या गुजरती होगी जो उम्मीद के चारों ओर खुद के अस्तित्व को तलाश कर रहे थे ....ये कोई और बल्कि उन्ही तरह के लोग है .....क्या होता होगा उस बहन का जो अपनी सहेलियों को बडी फक्र से ये बताती है कि उसका भाई सेना में है और वो जब छु्ट्टी में आएगा तो उसके लिए सलवार सूट लाएगा ....कैसे संभालती होगी वो मां अपने दिल को जिससे उसका बेटा ये कहकर गया था कि मां तुम्हारी आंखे को अब चश्मा की जरुरत है ...इस बार मैं जब वापस आउंगा तो तुम्हारी आंखे किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाउंगा ...कितना दर्द होता होगा उस उससे ये कहकर गया था कि पिताजी जब इस बार आउंगा तो आपके लिए एक बेंत लाउंगा.....शायद ये सारी बातें ये नक्सली न समझेंगें क्योंकि ये तो सिर्फ आमआदमी और गरीब आदमी का शोषण करके अपना स्वार्थ सिद् कर रहे है ....शायद यही वजह है कि इनके लिये न तो आम आदमी का खून कोई मायने रखता है और न ही ये बात किसी को कितना दर्द होता है ....अब जवान करें तो क्या करें एक तरफ सरकार तो दुसरी तरफ नक्सली इन दोनों के बीच घर के लोगों की उम्मीदें जो उसकी सासों पर भारी पडती है शायद यही वजह है कि वो चाहता है कि उसके घऱ वालों को कोई ताना न दे कि उनका बेटा गद्दार था .....अरे नक्सलियों जरा सोचों उस दर्द को जिस दर्द की बात तो तुम लोग करते हो ....लेकिन उसे महसूस नही करते ....क्योंकि सच तो बस इतना हैकि तुम आम आदमी के हक की लडाई नही बल्कि अपने स्वार्थ की लडाई लड रहे हो .......
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