सोमवार, 24 मई 2010


आज हर कोई प्यार का भूखा है ....सभी को प्यार चाहिए और असली प्यार चाहिए मतलब दिल से चाहने वाला ....हर कोई चाहता है कि उसे जो चाहे वो बस उसे ही चाहे और किसी को नही ये बात और है हर व्यक्ति ऐसा चाहने वाला अपने आपसे ऐसी उम्मीद नही ऱखता .....वो अपने लिए फार्मूला रखता है कोई भी दुखियारी उसके दर से खाली न जाए अगर किसी ने प्यार से दो बातें कर ली तो समझो हुजूर लग गये अपने काम में और हाथ आए इस मौके को वो किसी भी तरह से भुनाना चाहते है ....वर्तमान में प्यार के बाजार में भावनाओं की कद्र काफी पहले खत्म हो चुकी थी ....और अहसासों का दायरा भी सिमट गया है अब अगर वर्तमान में कुछ बचा है तो वो है ...उत्तेजना ॥और प्यार का सारा खेल इसी उत्तेजना पर चल रहा है ....अब चूकि उत्तेजना तो अस्थाई होती है इसलिए एक दिन प्यार होता है और दूसरे दिन दिल के खांचे में कोई और फिट हो जाता है। मतलब जितनी देर उत्तेजना उतनी देर प्यार उसके बाद फिर से खेल शुरु हो जाता है प्यार के खेल का ....एक बात गौर करने वाली है ....ज्यादातर हमारे सामने ऐसे किस्से आ रहे है जिसमें कुआरी लडकियां या तो गर्भवती हो जाती है ...या फिर बलात्कार की शिकार हो जाती है ....ये उसी प्यार का ही एक हिस्सा है किस्सा ये भी सामने आता है कि लडके ने बहुत दिनों तक शादी का झांसा देकर लडकी का शारीरिक शोषण करता रहा बाद में उसने शादी करने से मना कर दिया ....ये भी आजकल के चलन में रहने वाले उत्तेजनात्मक प्यार का ही एक हिस्सा है ...लोग भले कहते हो कि प्यार कभी बदलता नही ....लेकिन आज जमाने के साथ प्यार की परिभाषा भी बदली है ...पहले जमाना था जब प्यार भावनाओं के इर्द गिर्द घूमता था लेकिन आज का प्यार कपडो के आसपास स्टैंण्डर्ड के आसपास आपकी खूबसूरती के आसपास घूमता है ....अगर बात करें तो लडकों को आजकल के लडकों को उस लडकी से उतनी ही जल्दी और उतना ही ज्यादा प्यार होता है जितने वो लडकी कम कपडे में दिखती है ....अब प्यार के लिए सादगी और भावनाओं की कद्र करना नही जरुरी है बल्कि सेक्सी होना जरुरी है ....अगर लडकी सेक्सी नही है तो उससे कोई प्यार नही करने वाला और अगर वो सेक्सी है तो हर कोई प्यार करने को तैयार है ...अगर लडकियों की बात करें तो वो जमाना चला गया जब लडकियों को सिर्फ सच्चे दिल से प्यार करने वाला चाहिए होता था ...अगर आपके प्यास किसी लडकी को देने के लिए सच्चे दिल का प्यार है और ईमानदारी की खाने के लिए रोटी दाल है तो आप किसी भी लडकी से प्यार करने का इरादा बदल जाईए क्योंकि अब प्यार के लिए न सिर्फ आपका स्मार्ट होना जरुरी है बल्कि आपके पास गाडी बंगला और सोसाइटी में रुतबा भी होना जरुरी है इतना ही नही अगर आप किसी लडकी को रेस्टोरेंट में ले जाकर उसके साथ डिनर नही ले सकते उसे शॉपिंग नही करा सकते है तो प्यार आपके लिए इतिहास की चीज हो गई है क्योंकि प्यार का जो नया स्वरुप वो अब यही है ......ये किस्से भी इसी प्यार की तस्वीर पेश करते है ......मुलाकात हुई थोडी जान पहचान हुई कि प्यार हो गया ....प्यार हुआ नही कि सपने बनने लगे और इन सपनों में एक जो आम बात होती है वो होती है कभी न जुदा होनी की ....और उसके लिए फिर शुरुआत जिस्म और जान से एक होनी की .....और ऐसा करने के लिए बहुत जल्द ही स्थापित हो जाते है शारीरिक संबध .....शारीरिक संबध होने के बाद प्यार का परवान घटने लगता है......और फिर शुरु हो जाते है आरोप प्रत्यारोप के सिलसिले .....क्योंकि जब तक उत्तेजना थी तब प्यार का बुखार था जैसे ही उत्तेजना खत्म हुई प्यार का बुखार उतर जाता है.....मतलब अब प्यार की गारंटी उतनी ही देर की है जब तक उत्तेजना है ...लोग आजकल प्यार का पात्र का बनने के लिए अपने आपको सजाते है बडी बडी बातें बातें करते है और अपने आपको अट्रैक्टिव बनाने के लिए हर वो कुछ करते है जो किसी को उनकी तरफ अट्रैक्ट कर सके लेकिन किसी की तरफ अट्रैक्ट होना अलग बात है और किसी से प्यार होना अलग बात है आप अगर मल्लिका शेरावत की तरफ अट्रैक्ट होते है तो आपकी दूसरी भावना होगी लेकिन अगर आपको लता मंगेशकर अच्छी लगती है तो उनके लिए आपके जज्बात अलग होगे ......अब इतने तो आप भोले नही है किसी के लिए क्या जज्बात होंगे ये नही समझे ....ये ठीक है कि चहेता बनने के लिए आपका व्यक्तित्व अच्छा हो लेकिन जितना चहेता बनने के लिए आपके कार्य जरुरी है उतना आपका सजना संवारना नही और इसी की मिशाल पेश करते है सचिन तेंदुलकर लता मंगेशकर अमिताभ बच्चन और भी बहुत से लोग है जो इस तरह के है

सोमवार, 17 मई 2010


पहले मदनवाडा में नक्सलियों ने एस पी प्रदीप चौबे सहित ३५ जवानो को मौत के घाट उतार दिया....इसके बाद अभी सरकारी बयान की आंच ठंडी भी नही हुई थी कि फिर से नक्सलियों ने ये साबित कर दिया कि सरकार सिर्फ बातों के बतासे बनाती है न कि कारगर कारवाई यही वजह थी कि चिंतलनार में नक्सलियों ने देश का सबसे बडा हमला करते हुए ७८ जवानों को काल के गाल में पहुंचा दिया....इस हमले के बाद केंद्र सरकार को इस बात का अहसास हुआ छत्तीसगढ नक्सलियों से जूझ रहा है ...इसके बाद कई बयान आए चिंदबरम भी छत्तीसगढ आकर शहीदों के प्रति संवेदना जताई ...वही छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने एक बार फिर वही राग अलापते हुए सिर्फ ये कहकर अपने फर्ज से इति श्री कर ली कि नक्सली की ये कायराना हरकत है और इसे किसी भी कीमत पर नही बर्दास्त किया जाएगा ....लेकिन वही हुआ जिसका अंदेशा था नक्सलियों ने इतनी बडी घटना के बाद एक बार फिर से सरकार को ठेंगा दिखाते हए गादीरास में ब्लास्ट करके एक बस को उडा दिया ....और सरकार ने फिर वही रटा हुआ जवाब दोहराया कि अब रणनीति बदलने की जरुरत है ....इतना ही नही इस बार पुलिस जवानों के साथ नक्सलियों ने आम लोगों को भी निशाना बनाया ॥लेकिन सरकार सिर्फ रणनीति की बात करती रही और इस हवा को बल मिला कि अब हवाई हमले से ही नक्सलियों से निपटा जा सकता है ...मुख्यमंत्री से लेकर चिंदबरम को भी यही लगने लगा कि अब नक्सलियों के सामने कोई भी रणनीति काम नही कर रही है ....इसलिए अब केवल आखिरी विकल्प हवाई हमला है ....लेकिन मुख्यमंत्री और पी चिंदबरम ये भूल गए कि जो लोग छत्तीसगढ में नक्सली से निपटने के लिए तैनात है उन्हे इतना तक नही मालूम है कि नक्सलियों के कंमाडर कौन है और जो लोग नक्सली है वो कौन है ...खुफिया तंत्र इस हालत में है कि उसे पता ही नही चलता कि नक्सली कब हमला करने वाले है ....इतना ही नही जो सुरक्षा बल दंतेवाडा बस्तर सुकमा नारायणपुर पंखाजूर जैसे इलाके में तैनात है उन्हे ये नही मालूम कि आखिर नक्सली है कौन ....मतलब अगर नक्सली उनके सामने आ भी जाए तो वो आम आदमी और नक्सली में अंतर कर पाने में असमर्थ है ....ऐसे में किस पर हवाई हमला किया जाएगा निर्दोष लोगों पर जो पहले से ही सरकार और नक्सली के बीच पिस रहे है नक्सलियों के साथ रहे तो सरकार पीसती है और सरकार का समर्थन करें तो नक्सली मौत के घाट उतारते है .....अब बेचारे आम आदमी जाए तो कहां जाए ......नक्सलियों से निपटने के लिए तरह तरह की बातें हो रही है लेकिन ये बात अभी तक नही हुई कि आखिर ये नक्सलवाद पनपा क्यों .....ये सही है कि आज नक्सलवाद जिस उद्देश्य को लेकर पनपा था वो कही पीछे छूट गया है लेकिन क्या उस समस्या का खात्मा हो पाया है जिसकी वजह से ये वाद पनपा था ....शायद नही ...जिन आदिवासियों के लिए ये राज्य बना था उन्ही बस्तर के आदिवासियों को ये नही मालूम है कि आखिर बीपीएल कार्ड होता क्या है .....जबकि छत्तीसगढ सरकार ये ढिढोंरा पीट रही है कि वो हर गरीब की भूख मिटाने के लिए एक रुपये में चावल मुहैय्या करा रही है....इतना ही नही लोगों को उन राजनेताओं के नाम नही मालूम है जो इस बात में कहने से पीछे नही हटते कि उनका अपना जनाधार है......वहां के लोगों की अपनी दुनिया है जिसमें न तो चकाचौंध है और न ही सरकार की योजनाओं का लाभ ....किसी तरह वो अपने पेट की भूख मिटाते है और अपनी गरीबी में ही मस्त रहते है.....आज सरकार नक्सलियों से क्यों नही निपट पा रही है क्योंकि वो इन गरीबों के मानसिकता में अपनी जगह नही बना पाई उन्हे नही पता है कि सरकार क्या है शायद यही वजह है कि नक्सली इन सीधे साधे लोगों को बरगलाकर सरकार के खिलाफ इस्तेमाल करते है .....ये बात तो सिद्द हो गई है कि नक्सलवाद अपने मूल उद्देश्य से भटक गया है....और ये भी साफ है कि नक्सलवाद को जो लोग हैंडल कर रहे है वो कहीं न कही अपना मतलब साधने के लिए सीधे साधे आदिवासियों को बरगलाकर इस आंधी में झोंक रहे है क्योंकि सुरक्षाबल की गोली का निशाना ये बडे नेता नही बल्कि वो युवा आदिवासी होते है जिन्हे ये भी नही मालूम कि जो लडाई वो लड रहे है आखिर उसका उद्देश्य क्या है .....इसलिए अगर सरकार को ये लडाई जीतनी है तो वहां रहने वाली जनता का पहले विश्वास जीतना होगा तभी असली मायने में ये लडाई जीती जा सकेगी वरना हर हमले निर्दोष लोग ही मारे जाऐंगे क्योंकि नक्सलियों की कोई पहचान तो है नही इसलिये जो दोषी होगें वो आम आदमी बन जाऐंगे और जो बेकसूर होगे वो फिर से सुरक्षाबलों की गोली का निशाना बनेगें......

रविवार, 18 अप्रैल 2010

एक बार फिर ये साबित हुआ कि दौलत से बहुत कुछ खरीदा जा सकता है लेकिन सब कुछ नही ....जीं हां अपने बाप की दौलत और पद के नशे में चूर हरियाणा के राजनेता विनोद शर्मा के बिगडैल बेटे मनु शर्मा को शायद इस बात का इल्म नही था कि उसके बाप की दौलत और उसकी पहुंच में इतना पॉवर नही है कि वो उसके गुनाह की सजा को खरीद सकें .....जेसिका लाल हत्याकांड में भले ही ग्यारह साल बाद ये साफ हुआ हो कि मनुशर्मा अब होटलों में बैठकर शराब की प्यालियों की चुस्की नही लेंगें बल्कि तिहाड की जेल की आबोहवा को चखेंगे....लेकिन इस फैसले के बाद ये बात जरुर साबित हो गई है कि राजनीति को अपने हाथों की कठपुतली बनाकर उसको अपने मतलब के लिए यूज करने वालों के हाथ अभी भी इतने लंबे नही हुए है कि वो इंसाफ को अपने मनमुताबिक ढाल सकें ....१९ अप्रैल १९९९ में ये वारदात टैमरिड कोर्ट में घटी थी ....जहां पर जेसिका शराब परोसा करती थी ....राजनीति की काली कमाई में पले बढे मनु शर्मा इतना बिगडैल हो गया कि उसे न पसंद नही आता था ....और यही वजह रही है कि जब जेसिका ने उसे शराब परोसने से मना कर दिया तो उसने अपने दोस्तों को अपनी रंगबाजी औऱ अपने बाप का धौंस दिखाने के लिए जेसिका को गोली मार दी ....मामला कोर्ट गया लेकिन बडी अजीब बात कि सत्र न्यायालय ने उसे बाइ इज्जत बरी कर दिया .....और एक बार फिर ये लगने लगा कि दौलत और उंचे पद पर बैठे हुए लोगों के लिए सब कुछ माफ है .....लेकिन अपनी सनसनीखेज खबरों के लिए बदनाम हो चुके मीडिया इस बात को पचा नही पाया खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया ....और उसने मनु शर्मा के खिलाफ एक मुहिम छेड दी ....मामला हाइकोर्ट पहुंचा और हाइकोर्ट ने इस मामले में मनु शर्मा को उम्रकैद की सजा सुनाई .....जो उम्मीदें सत्र न्यायालय के फैसले के बाद दम तोड रही थी ....हाइकोर्ट के फैसले के बाद ऐसा लगा कि उन्हे एक बार फिर से सासों ने साथ दे दिया है और फिर वो खडी हो गई पूरे दम खम से इंसाफ मांगने के लिए .....हालांकि इस मामले में जिस तरह से बहुत से लोग बयान देने की बात से मुकर गये या फिर जो लोग वहां थे उन्होने भी ये कह दिया कि उन्होने कुछ देखा नही है ....उससे ये बात तो साफ हो गई है कि इंसाफ सभी चाहते है लेकिन उस इंसाफ की कीमत कोई नही चुकाना चाहता है क्योंकि ये लोग सोंचते है कि इसमें जेसिका को गोली मारी गई उनके किसी घर वाले को नही फिर क्यों वो फालतू झमेले में पडे .....हालाकि ऐसे लोग ये भूल जाते है कि उनकी ये चुप्पी सिर्फ एक चुप्पी नही है कि बल्कि ये इस बात का इशारा है कि आप जो कर रहे है करते जाइये हम कुछ नही बोलेगें ....क्योंकि ये हमे स्वीकार है......खैर फिर से आते है हम इंसाफ की बात पर ....मनु शर्मा ने जब ये देखा मीडिया ने एक मुहिम छेड दी है और जिन सबूतों को पर्याप्त न मानकर सत्र न्यायालय ने उसे बरी कर दिया था ....मीडिया की मुहिम के बाद उन्ही सबूतों को पर्याप्त सबूत मानकर हाइकोर्ट ने मनु शर्मा को उम्रकैद की सजा सुना दी ....मनु शर्मा ने सोंचा कि क्यों न मीडिया की ताकत का इस्तेमाल वो अपने आपको बेगुनाह साबित करने के लिए करे ....और इसके बाद उसने अपने बाप की दौलत को इंडिया न्यूज चैनल आज समाज अखबार और इंडिया न्यूज पत्रिका को खोलने में लगाया ....वो सोंच रहा था कि चैनल अखबार पत्रिका खोलकर वो मीडिया लॉबी में शामिल हो जाएगा ....और जो तपिश मीडिया ने उसके खिलाफ छेड रखी है वो शांत हो जाएगी .... लेकिन अभी भी ऐसा नही हुआ है कि मीडिया अपना पूरा का पूरा जमीर बेंचकर सिर्फ खाने खिलाने में ही लग जाए ....और वही हुआ जिसका देश के तमाम उन लोगों को इंतजार था जो रईसजादों के शौक का शिकार होते है ....१९ अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने अपने अहम फैसले में मनु शर्मा की वो सजा बरकरार कर रखी जो हाइकोर्ट ने सुनाई थी .....इस फैसले के बाद एक बार फिर से उन उम्मीदों को संबल मिला होगा जो पैसे पहुंच और रईसजादों के शौक का शिकार होकर समाज से घुटघुट कर मरती रहती है ....इंसाफ के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाती है लेकिन न्याय की प्रक्रिया पैसे की धार के आगे इतनी लंबी हो जाती है कि उनकी जिंदगी भी छोटी पड जाती है .....यहां पर ये जरुर कहना चाहूंगा कि मॉडल जेसिका लाल हत्या कांड में इंसाफ इसलिए मिल सका क्योंकि न सिर्फ ये हाईप्रोफाइल मर्डर बन चुका था बल्कि ये मीडिया की नजर में था लेकिन आज भी लाखों ऐसे खून से रंगे हाथ है जिन्होने अपने शौक के लिए कई घरों के चिराग बुझा दिये इसके बावजूद उन हाथों में हथकडियां नही है बल्कि शराब की चुस्कियां थामे वो ऐश कर रहे है औऱ खुलेआम घूम रहे है वहीं जो लोग इंसाफ चाह रहे है वो कोर्ट की दहलीज के चक्कर लगा लगा कर अपनी जिदंगी के आखिरी मोड पर पहुंच गये है लेकिन इंसाफ है कि मिलता ही नही क्योंकि जब भ्रष्टाचार इस कदर बढ जाए कि हर कहीं उंचे ओहदे पर बैठा आदमी ये सोचने लगे कि किस तरह से पैसा बनाया जाए तो ये कैसे सोंचा जा सकता है कि न्यायापालिका में बैठे लोग इमानदार ही होंगे .......भला ऐसा होता तो क्या किसी को इंसाफ मिलने में पचासों साल लग जाते ...हालाकि अभी भी उम्मीद बनी है कि आज भी ऐसे लोग न्यायापालिका में है जो इंसाफ के तराजू को बराबर रखते है और इसी का परिणाम है कि मनु शर्मा को उम्र कैद की सजा बरकरार रखी गई .....ये किरण है उन लोगों के लिए जिनकी उम्मीद बूढी हो चुकी थी और दम तोड रही थी

सोमवार, 15 मार्च 2010


हवाओं जरा फिर से तुम गीत गा दो

फिजाओं ऐ चेहरे से पर्दा हटा दो

लगी आज उनसे मिलन की लगन है

सूरज से धरती की दूरी मिटा दो

शनिवार, 13 मार्च 2010


महिलाओं के आरक्षण की बात अभी राज्यसभा से ही आगे बढ पाई थी कि सभी ओर हाय तौबा मच गई .....किसी को बच्चों की चिंता सताने लगी तो किसी को खुद की .....स्वतंत्रता सबको अच्छी लगती है ...और ये बात सभी पर लागू होती है बात चाहे पुरुषों की हो या फिर महिलाओं की ....लेकिन लगता है पुरुष वर्ग में कुछ लोग ऐसे है जो इसे अपनी बपौती मानते है ....हालांकि इसमें उनका कोई दोष नही क्योंकि विस्तार वहीं होता है जहां जगह होती और उनकी दिल दिमाग इस कदर सिकुडे हुए है कि वो दकियानूसी के बाहर जाकर कुछ सोच ही नही सकते ....दूसरी बात जब कोई घटना परपंरागत लीक से हटकर होती है तो ऐसे लोग या फिर समाज जल्दी से उसे स्वीकार नही कर पाता ....ऐसे लोग पहले प्रतिकार करते है और जब देखते है कि धीरे धीरे उस बात की ओर लोग जाने लगे है तो वो उसे स्वीकार कर लेते है ....इन्ही सिकुडे हुए दिमागी लोगों के प्रतिनिधि है कल्बे जव्वाद ....जिन्होने एक आमसभा में ये कहा है कि महिलाएं अच्छे नेताओं को पैदा करने के लिए है न कि खुद नेतागिरी करने के लिए .....शायद वो ये बात भूल गए है कि बच्चे सिर्फ अकेले औरत ही नही पैदा करती है बल्कि उसमें पुरुष भी सहभागी होता है ....मतलब बच्चे में मां बाप दोनों के गुण होते है ....और ऐसे में जब तक कल्वे जव्वाद जैसे लोग होंगे तब तक अच्छे नेता नही पैदा हो सकते क्योंकि एक नेता सिर्फ अपने परिवार को प्रभावित नही करता बल्कि वो देश के लाखों लोगों को प्रभावित करता है ...एक बात और कल्वे जव्वाद इस बात को अच्छी तरह से जानते है कि कोई महिला अच्छे नेता पैदा कर सकती है लेकिन ये बात भूल जाते है कि एक महिला घर की इज्जत को दहलीज के पार ले जाकर उसका सडक पर मजाक भी बना सकती है ....अभिषेक बच्चन की जब शादी हो रही थी तब अभिषेक के साथ शादी होने की बात इन्ही के खानदान की बहू जाह्नवी ने कही थी वो इसलिए नही कि वास्तव में शादी हुई थी बल्कि इसलिए कि इतने बडे सितारे के बेटे के साथ अपना नाम जोडकर उथली पब्लिसिटी पा लें ....मैं ये बात इसलिए कह रहा हूं कि जव्वाद साहब ये अच्छी तरह से समझ लें कि अच्छा कोई पेट से नही बल्कि संस्कारों से बनता है ....और संस्कार पेट के अंदर नही बल्कि बाहर सिखलाये जाते है ....जव्वाद जैसे लोग उन लोगों में है जो दूसरे की पत्नियों को देखकर तो उनकी हर अदा पर चटखारे मारने के बेकरार रहते है लेकिन अपनी बीवी को सात पर्त के अंदर रखने की ख्वाहिश रखते है ....जव्वाद मुस्लिम समुदाय से है और मुस्लिम समुदाय हमेशा से ही महिलाओं की स्वतंत्रता का विरोध करता रहा है ....उसने हमेशा ही औरत को पर्दानसीन एक चीज समझा है न कि एक एक ऐसा अक्स जिसमें भावनाएं है ....क्योंकि अगर उसने ऐसा समझा होता तो जव्वाद जैसे लोग ये बयान न देते कि महिलाएं अगर राजनीति में आना चाहती है तो वो पहले इस्लाम धर्म छोड दे उसके बाद राजनीति में जाएं.....शायद इस्लाम धर्म को जव्वाद जैसे लोगों ने अपने घर की बकरी समझकर रखा कि जब चाहेगें तो वो उसको दुहकर अपना स्वार्थ सिद्द कर लेगें और जब चाहेंगें तो उसे खुला छोड देंगें....जव्वाद जैसे लोग उन लोगों में से है जिनका कोई धर्म नही होता बल्कि ये धर्म को अपना हथियार बनाकर अपनी हार को छुपाना चाहते है ....अभी तक अपनी हर आवाज को महिलाओं के लिए कानून बनाने वाले ये लोग अब इस बात से डर रहे है कि कहीं संसद में बैठकर ये महिलाएं उनके लिए कानून न बनाने लगी ....क्योंकि अगर महिलाओं को लोकसभा और विधान सभा में आरक्षण मिल गया तो न सिर्फ महिलाओं का संसद में बोलबाला हो जाएगा ....बल्कि बहुत सी महिलाएं पर्दे से बाहर भी आ जाएगी और यही बात जव्वाद जैसे लोगों का पेट खराब कर रही है .... अब जरा उन नेताओं की बात कर लेते है जो आरक्षण पर अपनी भृकुटियां ताने हुए है और नही चाहते कि ये आरक्षण कानून बने ...इनमें मुलायम लालू और शरद यादव है .....ऐसा नही है कि आरक्षण के बाद महिलाएं इनसे रोटी बनवाऐंगी या फिर झाडू लगाऐगीं ...बल्कि डर इन्हे इस बात का है कि कहीं इनकी राजनीति की दुकानदारी की बिक्री धीमी न हो जाए .....कई ऐसी पार्टियां जिनसे एक भी महिला जीतकर संसद नही पहुंची ....साथ ही बहुत से ऐसे भी नेता है कि जो एक ही सीट से हर बार जीतकर संसद और विधान सभा में पहुंचते है ....ऐसे लोग महिलाओं के आरक्षण से नही बल्कि अपनी राजनीतिक रोटी के बासी होने से डर रहे है ...और यही वजह हैकि ये लोग इस बिल का विरोध कर रहे है .....


खुदा ने आदमी भी चीज क्या लोगों बनाई है


गमों के दायरे में आंख जिसकी मुस्कराई है


जिंदगी भी बहुत कुछ देके उससे छीन लेती है


कभी कर्मों का धोखा है कभी किस्मत पराई है



दिल ये कहता है कि होठों का मैं इजहार बन जाउं

तेरी बजती हुई पाजेब की झनकार बन जाउ

मुझको दौलत से खरीदा नही जा सकता मेरी जां

मेरी हसरत है मुफलिसी का मैं बाजार बन जाउं